यह गाँव अब गाँव नहीं रहा

Cover artwork for यह गाँव अब गाँव नहीं रहा
POETRY

बचपन में नन्हे कदमों से,
मैं दौड़ जाती थी खेतों में,
दादा जी के लिए पानी ले के
दादी जी के लिए गुड़ हाथों में

गर्मी थी, पसीना था,
हुमस थी और जून का महीना था।
तब गर्मी इतनी भी न लगती थी,
रात में छत पर चटाई बिछती थी।

एक भैंस थी मोटी काली सी,
बड़े बड़े सींगों वाली सी
मैं पास ना उसके जाती थी
वो मारेगी, ये चिल्लाती थी

दादी दाल चावल रोटी बनाती थी
माँ आलू की सब्जी में,
प्याज़ का तड़का लगाती थी

पास ही था घर चाची का
कुछ कच्चा सा, कुछ छोटा सा
मैं वहाँ रोज़ खेलने जाती थी
मीठी जामुन खाती थी।

पर अब कहाँ वो बातें हैं
गाँव में भी सन्नाटे हैं।

है ज़मीन वही, इंसान वही
बस रूह अंदर से बदल गई
तुम देखो सबकी आँखों को
अब मिजाज़ से थोड़ा बदल गई

, जाती हूँ वहाँ, पर अब,
दीवारें सी नज़र आती हैं
नज़र आती है सबकी असलियत
बस यादों की याद आती है

है पेड़ वही, जगह वही,
घर वही, आसमान वही
हैं लोगों के आशियाने अब भी वहीं हैं
पर यह गाँव अब गाँव नहीं रहा


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