वो रात

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SHORT STORIES

मैं 23 वर्षीया टीना हूँ। मैं अपने माता-पिता और छोटी बहन ,निशा के साथ देहरादून में रहती हूँ। मेरे पिता अक्सर व्यवसाय के सिलसिले में बाहर रहते हैं। मेरी मां एक गृहिणी हैं।

दो महीने पहले की वह रात मैं कभी नहीं भूल सकती। उस रात मूसलाधार वर्षा हो रही थी।पिताजी हमेशा की तरह लखनऊ गए हुए थे। मम्मी भी पापा के साथ ही गई हुईं थीं। मैं और मेरी बहन ही घर में अकेले थे। बाहर लगभग तूफान ही था।
अचानक दरवाजे पर घंटी बजी। निशा ने आवाज़ देकर मुझे कहा,"दीदी,दरवाजा मत खोलना। पता नहीं कौन है इस तूफान में ।"

दरवाजे पर दुबारा घंटी की आवाज़ आई।

मैेंंनेंं टीवी की आवाज़ बंद की और दरवाजा खोलने के लिए उठी। दरवाज़ा खोलने पर मैंनें एक  युवक को अपने  सामने पाया। मैंनेंं कहा ," जी कहिये।"
वह युवक अत्यंत आकर्षक था।लम्बा, हरी आंखें, घुंघराले बाल और आयु 22 के आसपास।पहली नज़र मे मैं उसकी ओर आकर्षित हो गई।
उसने उत्तर दिया," हाय।मेरा नाम रोहित है। मेरी कार खराब हो गई है। इतने तूफ़ान में ठीक भी नहीं करवा सकता। एक आपके घर में लाइट जलती देखी तो  मदद मांगने आ गया।क्या तूफान थमने तक यहां रूक सकता हूँ?"

इतने में निशा भी  आ गई। उसने मेरी तरफ इशारा कर के पूछा,"कौन है?"

मैंनें जवाब दिया,"राहगीर है। मदद मांग रहे हैं।"

निशा ने कहा," ओके।" यह कहकर वह अंदर चली गई।मैंने उसे अंदर आने को कहा। रोहित पूरी तरह भीगा हुआ था। मैं यह सोच कर घबरा गई कि अगर वह बीमार पड़ गया तो उसे ज़्यादा दिन घर रखना पड़ सकता है। मैं अंदर से उसके लिए  तौलिया और कपड़ें लेकर आई। मैंनें उसे कहा,"रोहित,आप चेंज कर लो।मैं आपके लिए कुछ खाने को लाती हूँ।"

रोहित ने कहा,"थैंक्यू।पर आप नहीं तुम कह सकती हो।"

मैें जवाब दिए बिना उसके लिए खाना लेने चली गई।तब तक के लिए मैंने निशा को उसके पास बैठने को कहा।चाय बनाते हुए मैं यह सोच रही थी,"कहीं मैंनेंं एक अनजान व्यक्ति को पनाह देकर कुछ गलत तो नहीं कर दिया? अगर वह कोई चोर हुआ तो?"फिर मैंने सोचा," इसकी इतनी महंगी कार है।पर यह कार चोरी की भी तो हो सकती है।"

फिर ध्यान आया ,"मैं घर में अकेली थोड़ी हूँ।निशा भी तो है।वह एक और हम दो।" अगर अनजान व्यक्ति को पनाह देना गलत है तो ऐसे तूफान में उसकी सहायता न करना शायद और भी गलत होता।

यही सब सोचने में चाय बन गई और खाना भी गर्म हो गया। जैसे ही मेज पर मैंने खाना लगाया रोहित बोला,"अरे,तुम तो इतना कुछ कर रही हो।थैंक्यू।"

मैंने उत्तर में उसको बस बैठने को कहा। मुझे रोहित काफी बातूनी लगा। जल्दी ही उसने खाना समाप्त कर लिया।

इसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। रोहित ने कहा,"मैं देहरादून किसी काम के लिये आया था।रास्ते में यह भीषण बारिश शुरू हो गई।होटेल ही जा रहा था। पर कार खराब हो गई। कल कार ठीक करवा कर दिल्ली लौट जाउंगा।"

मैंने पूछा ,"तुम क्या करते हो,रोहित?"
उसनें जवाब दिया,"मैं एक ज्यूलर हूँ।सोने के गहनों को बनाने और ,बेचने का काम है। गहनों की डिलीवरी करने ही आया था।तुम क्या करती हो?तुमने तो अपना नाम भी नहीं बताया।"

मैंने जवाब दिया,"टीना।मैं एक इंटिरियर डिजा़इनर हूँ।"

अब तक निशा अपने कमरे में चली गई।
रोहित ने पूछा,"तुम टीवी देख रही थी क्या?"

मैंने कहा,"हां।"

उसनें फिर पूछा,"क्या देख रही थी?"

मैंने कहा,"मूवी। तुम कभी चुप बैठते हो?"

यह सुनकर वह हंसने लगा और उसने मुंह पर उंगली रखली।

रोहित ने एक पत्रिका उठा ली और उसके पन्ने पलटने लगा।मैं  टीवी देखने लगी। हम दोनों ही एक दूसरे को चोरी छिपे देख रहे थे। पर यह पता नहीं लगने दे रहे थे कि हम चुपके-से एक दूसरे को देख रहे। दोनों एक दूसरे की ओर आकर्षित थे।पर यह केवल एक सामयिक आकर्षण ही था। मेरा दिल तो तेजी से धड़क रहा था। उसके साथ भी शायद ऐसा ही था। वह भी कुछ कहना चाहता था और मैं भी।पर दोनों से कुछ नहीं कहा गया।

अचानक रोहित ने मुझे पूछा,"मेरे जाने के बाद कभी याद करोगी मुझे?"

ऐसे प्रश्न की  आशा मैं बिल्कुल नहीं कर रही थी।समझ नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूं। लेकिन मैं बोली,"मैं तुम्हें याद क्यों करूंगी भला?"

रोहित ने कहा,"यह बात तो सही है।क्यों करोगी याद मुझे?पर मुझे तो तुम्हारी बहुत याद आएगी।"
मैंने पूछा,"क्यों?"

उसने कहा,"क्योंकि....." कुछ कहते-कहते वह रुक गया।

मैंने फिर कहा,"क्योंकि...?"

वह बोला,"क्योंकि... क्योंकि तुमने मेरी इतनी मदद जो की। कौन करता है आजकल एक अनजान की मदद? मैं कोई गलत व्यक्ति भी तो हो सकता था।"

मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया।परन्तु मुझे पता था कि  मैं उसे याद ज़रूर करुंगी।वहीं बैठे-बैठे हम दोनों को नींद आ गई।

सुबह निशा ने आकर मुझे उठाया। मैंने उठकर चाय और नाश्ता बनाया। तब तक रोहित उठा और तैयार हो गया। नाश्ता कर उसने कहा,"लगता है बारिश रुक गई है।मैं किसी मैकेनिक को देखता हूँ।"मैंने उसे मैकेनिक की दुकान के बारे में बता दिया।दो घंटे में रोहित की कार ठीक हो गई।

अब उसके जाने का समय आ गया।रोहित कुछ कहना चाहता था और मैं भी। रोहित का जाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था।परन्तु कोई ऑप्शन बाकी नहीं था और न कोई बहाना।

मैंने कहा,"बाय।"

रोहित ने पहले निशा को बाय कहा।फिर वह मेरी तरफ मुड़कर बोला,"इतनी मदद के लिये थैंक्यू।बस जाते हुए यही कहूँगा कि मैं......"
मैंने पूछा,"क्या..?"

रोहित ने जवाब दिया,"मैं फिर आऊँगा।इस बार....। बाय"

इससे आगे मैं कुछ पूछती ,वह चला गया।

बस Half Girlfriend गाने की यही पंक्तियाँ याद आईं

ये मौसम की बारिश, ये बारिश का पानी
ये पानी की बूंदें, तुझे ही तो ढूंढे।।

the end.


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