आख़िर क्यों हम दोस्त पहले हैं?
आख़िर क्यों हम दोस्त पहले हैं?
कि दुःख सुख फिर भी आसानी से बाँटा जाए
कि छोटी छोटी बातों का बुरा न माना जाए
एक दूसरे को स्पेस दी जाए
गले लगाने पे वो असहजता न हो।
के आख़िर क्यों हम दोस्त पहले हैं?
एक दूसरे को समझने के लिए,
कुछ वक़्त और मिल जाए।
तू चाहे मुझे हर पल,
पर जताने के लिए कुछ पल और मिल जाए।
है फ़िक्र मेरी हर घड़ी तुझे,
है चिंता तेरी बातों में,
ये समझाने के लिए कुछ वक्त और मिल जाए।
कि आख़िर क्यों तेरे मेरे रिश्ते में, हम दोस्त पहले हैं?
इस तरह मेरी सुरक्षा की फिक्र है,
कि तेरा छूना भी असहज नहीं लगता।
तू आ कर जब सांत्वना दे तो,
वो कभी अनजाना नहीं लगता
मैं जान सकती हूँ तुझे,
पहचान सकती हूँ तुझे,
पर समझ में तू मुझसे कहीं बड़ा है।
अगर यहीं सब शर्तें और बातें हैं तेरे मन में
मेरी ख़ुशी और फ़िक्र को लेकर,
तो हाँ माना मैंने
कि आख़िर इस रिश्ते में,
हम दोस्त पहले हैं...
हम दोस्त पहले हैं....