आज का मौसम
POETRY
ऐसा ही कुछ मौसम है,
मेरे मन के भीतर भी।
ना पूरी आशा है इस कोने में,
कहीं पहरे पर है निराशा भी।
ना वो विजयी बिंदू दिखाई पड़ता है,
कहीं विलुप्त है पराजय का ध्वज।
ना किसी ओर कहीं किनारा है,
चहुँ ओर अनिश्चितता का भव-सागर पसारा है।
यहाँ अब मायूसी का सैलाब आए,
या आशंका है कहीं पड़ ना जाए सूखा भी।
ऐसा ही कुछ मौसम है,
मेरे मन के बाहर भी,
और मेरे मन के भीतर भी।