उलझन: हर जगह कमी

Cover artwork for उलझन: हर जगह कमी
POETRY

सुनने में छोटा है, पर इसका कद बहुत बड़ा है,
'कमी' का ये साया, हर किसी की दहलीज पर खड़ा है।
इंसान में कमी, धरती में कमी, ये संसार ही अधूरा है,
यहाँ जो भी देखो, बस एक अनकहा सा अधूरापन पूरा है।
सब उलझे हैं इसी उधेड़बुन में, कि हर तरफ खालीपन है,
कहीं रिश्तों की दरारें हैं, तो कहीं अधूरा ये मन है।
पर शायद ये 'कमी' ही है, जो हमें हारने नहीं देती,
कुछ नया रचने की चाह में, कभी चैन से बैठने नहीं देती।
गर सब कुछ पूरा होता, तो फिर कलम कौन उठाता?
इस 'कमी' के बिना भला, कोई कलाकार बन पाता?


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