तन्हा रातें
POETRY
कि रातें सोने के लिए होती है,
दिन भर कि थकान को कुछ पल,
राहत देने के लिए होती है,
कि ये रात सुकून की रात होती है।
पर क्यूँ फिर ये रात,
मुझे ख़ुदद में खींच लेती है,
हर रोज़ उसकी क़ैद से बचती मैं,
रोज़ उसकी गिरफ़्त में चली जाती हूँ।
कुछ तो माजरा है,
जो समझ से परे है।
और फिर मेरी हर रात,
खुद में खुद को ढूँढने की रात होती है,
किसी तलाश की रात होती है।