कौन हूँ मैं?
POETRY
मैं कलकल बहती नदी हूं,
मैं पर्वत की विशालता हूं,
मैं ही फूलों की सुगंध हूं,
मैं धरा हूं।
मैं प्रेरणा हूं,विश्वास हूं,
मैं रोशनी हूं, मैं ही अंधेरा हूं।
किसी के लिए प्रेम हूं,किसी के लिए नफरत हूं,
किसी की सांस हूं,किसी की आस हूं।
मैं गीत हूं ,संगीत हूं,
मै मधुर तान हूं,
मै ही साज़ तो मैं ही वाद हूं।
कहीं स्वतंत्रता हूं,कहीं परतंत्रता,
किसी का भूत तो किसी का वर्तमान हूं।
किसी के लिए धन, तो किसी के लिए सत्ता हूं,
किसी की अमीरी ,किसी की गरीबी हूं।
किसी की आस्था हूं,किसी के लिए बंदगी,
मुझमें ही ईश्वर है, मुझमें ही परमात्मा।
मैं मनुष्य हूं,
मैं इंसान हूं,
मत गवाओ मुझे ऐसे ही,
क्योंकि मैं जीवन हूं।
मै ही जीवन हूं।