माया दर्शन
माया दर्शन
श्री कृष्ण और सुदामा बहुत अच्छे और घने मित्र थे।अक्सर दोनों एक साथ घूमते थे।
एक दिन सुदामा ने कृष्ण से कहा ,"हे,कृष्ण,मुझे आपकी माया देखनी है। मै उसके दर्शन करना चाहता हूं।देखना चाहता हूं कि आपकी माया कैसी है?"
श्री कृष्ण ने इस बात को टालने का प्रयास किया। परन्तु सुदामा अपनी ज़िद पर अड़े रहे।
श्री कृष्ण बोले,"फिर कभी!"
कुछ दिन बाद श्री कृष्ण और सुदामा फिर मिले।
श्री कृष्ण सुदामा से बोले,"आओ सुदामा,गोमती में स्नान करने चलते हैं।"सुदामा मान गए और गोमती के तट पर पहुंच गए।
दोनों ने वस्त्र उतरे और गोमती नदी में उतर गए।श्री कृष्ण जल्दी ही स्नान करके तट पर लौट गए।
सुदामा ने देखा कि श्री कृष्ण तो अभी पीताम्बर पहन रहे।उन्होंने सोचा,"चलो एक डुबकी और मार लेता हूं।"
सुदामा ने अब की बार डुबकी लगाई तो उनको लगा कि गोमती नदी में बाढ़ आ गई है। उन्हें लगा कि पानी चढ़ा जा रहा है।वह बहे जा रहे हैं।सुदामा जैसे - जैसे घाट किनारे रुके,वैसे - वैसे पानी चढ़ता जाए। सुदामा तट पर नहीं पहुंच पा रहे थे। जैसे - तैसे वह घाट पर रुके तो घाट पर पानी चढ़ा और वह घूमने लग गए।
ऐसे ही घूमते - घूमते सुदामा एक गांव ,मायापुरी में पहुंच गए। वहां एक हथिनी थी जिसने सुदामा को माला पहना दी। सब गांववासी उनके पास आ गए। सुदामा हैरान कि यह सब क्या हो रहा है?
लोगों ने कहा," कुछ समय पूर्व हमारे गांव,मायापुरी के राजा की मृत्यु हो गई है।मायापुरी का एक नियम है कि राजा की मृत्यु के पश्चात हथिनी जिसके भी गले में माला डाल देती है ,वही हमारा राजा होता है।इसलिए आप आज से हमारे राजा हुए।"
इसके साथ ही सुदामा की जय जयकार होने लगी।सुदामा राजा बन गए। वह बहुत हैरान भी थे।बहुत जल्द सुदामा का विवाह राजकन्या से हो गया।उनके दो पुत्र भी हुए।
सुदामा की पत्नी एक दिन गंभीर रूप से बीमार हो गई। आखिरकार उसकी मृत्यु भी हो गई।सुदामा बहुत रोए।वह सुदामा की पत्नी को थी।अत्यंत सुशील,सुंदर और नेक। लोगों ने उनसे कहा,"महाराज,आप रोएं नहीं।आप हमारे राजा हैं।परन्तु जहां महारानी गईं हैं,आपको भी वहां जाना होगा।यही हमारी इस मायापुरी का नियम है। आपकी पत्नी की चिता को अग्नि दी जाएगी और इसके बाद आपको भी उनके साथ अग्नि में प्रवेश करना होगा।"
सुदामा के तो प्राण ही सूख गए।वह घबरा गए और बोले,"मेरी पत्नी की मृत्यु हुई है,मेरी थोड़ी।यह कैसा नियम है,भाई?"
वह अपनी पत्नी की मृत्यु को भूल गए। उनका रोना भी बन्द हो गया।वह अपनी ही चिंता में डूब गए।
सुदामा लोगों से बोले,"माना कि यह आपके मायापुरी गांव का नियम है। परन्तु मैं मायापुरी का वासी थोड़ी हूं। मुझ पर आपकी नगरी का कानून लागू नहीं होता। मैं साथ क्यों जलूं भला?"
लोग नहीं माने और बोले," हम कुछ नहीं जानते।आपको रानी के साथ मरना होगा उनकी चिता के साथ जलना होगा। यही यहां का नियम है।"
अंततः सुदामा ने कहा,"ठीक है,भाई।परन्तु मरने से पहले मुझे एक बार स्नान तो करने दो।"
लोग मान गए। उन्होंने साथ में हथियारबंद सैनिक भेज दिए। वह देख रहे थे कि कहीं वह भाग ना जाए। सुदामा रोए जा रहे थे। उनको मृत्यु साफ दिख रही थी। उन्होंने जैसे ही डुबकी लगाकर बाहर निकले,वैसे ही देखा कि मायानगरी कहीं भी नहीं थी। श्री कृष्ण अभी भी अपना पीताम्बर पहन रहे थे और वह एक दुनिया घूम आए।
सुदामा मौत के मुंह से बचकर आए थे। वह रोए जा रहे थे।
श्री कृष्ण सब जानते थे।
फिर भी बनते हुए उन्होंने सुदामा से पूछा,"अरे सुदामा ,क्या हुआ?क्यों रो रहे हो?"
सुदामा ने पूछा,"बताओ कृष्ण,सच क्या है?जो मैंने देखा वो या जो मैं अब देख रहा हूं वो?"
श्री कृष्ण ने कहा,"जो सब तुमने देखा या भोगा वो सब भ्रम था ,धोखा था। सब मेरी माया थी।सच नहीं स्वप्न था।जो तुम मुझे अब देख रहे हो...यही सत्य है। मैं ही सच हूं। जो भी मुझसे अलग है,वह मेरी माया है।जो भी मुझे हर जगह देखता है और महसूस करता है, उसे मेरी माया छू भी नहीं पाती।"
(जय श्री कृष्ण)