मेरी ज़िन्दगी।
मेरी ज़िन्दगी।
POETRY
कभी मैं ज़िन्दगी को
तो कभी मैं इन यादों को
तराशने की कोशिश करता था
इन लमहों को बयां करने वाले
ख़्वाबों को ढूँढ़ने की कोशिश करता था
मैं ज़िन्दगी का गुलाम था बस
चलता रहता था
कहीं इधर तो कहीं उधर बस
दर दर मरता रहता था
कभी ज़िन्दगी तो कभी दोस्त
धोखा देते थे
दोस्त कौन और दुश्मन कौन
ये मालूम नहीं बस मुझे
रोता देखना चाहते थे
क्या करूँ क्या ना करूँ
बस इसी में उलझा सा रहता था
ज़ालिम थी ज़िन्दगी या फिर
ज़ालिम थी मेरी तकदीर
दोनों में से कौन ये मालूम नहीं बस इसी में पलता रहता था
यादों का पता नहीं
नसीब मेरा खराब था
कातिल कोई और था
मगर गुन्हेगार मैं था
ज़िन्दगी का ये कैसा खेल था
जीतता कोई और था
और हमेशा हारता मैं था।