मेरी ज़िन्दगी।
मेरी ज़िन्दगी।
कभी मैं ज़िन्दगी को
तो कभी मैं इन यादों को
तराशने की कोशिश करता था
इन लमहों को बयां करने वाले
ख़्वाबों को ढूँढ़ने की कोशिश करता था
मैं ज़िन्दगी का गुलाम था बस
चलता रहता था
कहीं इधर तो कहीं उधर बस
दर दर मरता रहता था
कभी ज़िन्दगी तो कभी दोस्त
धोखा देते थे
दोस्त कौन और दुश्मन कौन
ये मालूम नहीं बस मुझे
रोता देखना चाहते थे
क्या करूँ क्या ना करूँ
बस इसी में उलझा सा रहता था
ज़ालिम थी ज़िन्दगी या फिर
ज़ालिम थी मेरी तकदीर
दोनों में से कौन ये मालूम नहीं बस इसी में पलता रहता था
यादों का पता नहीं
नसीब मेरा खराब था
कातिल कोई और था
मगर गुन्हेगार मैं था
ज़िन्दगी का ये कैसा खेल था
जीतता कोई और था
और हमेशा हारता मैं था।