पापा
Papa!
POETRY
बचपन में चलते हुए जब कदम डगमगाए..
हमें सँभालने के लिए पापा आप आए...
दशहरे के मेले में जब हम आपके कंधों पे बैठके जाते...
न जाने कितने गुब्बारे और खिलौने आप हमें दिलाते...
जब लाइट जाती तो पूरी रात पंखा झेलके हमको सुलाते..
खुद जगे रहते और हमे लोरियाँ गाके सुनाते..
सच के लिए तर्क करना आपसे सीखा..
श्ल़ोकों का सही उच्चारण आपसे सीखा..
आँखों में नमी लिए यही सोच रही थी कि ये अभिव्यक्ति करने का भी थोड़ा बहुत हुनर, पापा आप ही से सीखा..