मेरा जहाँ
POETRY
चल निकलें कहीं किसी जहाँ,
जहाँ कानून कुछ वाजिब सा हो,
चल ढूँढे, वो गालियाँ, वो चौबारे,
वो शामें, वो नज़ारे,
जहाँ जहान कुछ नया सा हो।
न हो आब ओ हवा में गिले शिकवे
न हो मन में घुटन के पर्दे,
मोहब्बत हो, दया हो,
एक ऐसा जहान हो,
जहाँ खुली किताब पढ़ने का समां हो।
बस और ख्वाहिश भी क्या की जाए...
नीले अंबर, काले बादल के तले
एक ऐसा जहान हो,
जहाँ ज़िंदगी की एक मुकम्मल दास्ताँ हो!