इंतज़ार
POETRY
कितने ज़माने हुए तेरे दीदार को,
हम तुझसे जुदा क्या हुए, ख़ुद को भी खो बैठे।
वक़्त की तेज़ी से फिसलती रेत,
देख कहीं जुदा ना करदे मेरे इंतज़ार को।
कितने ज़माने हुए तेरे दीदार को,
हम तुझसे जुदा क्या हुए, ख़ुद को भी खो बैठे।
वक़्त की तेज़ी से फिसलती रेत,
देख कहीं जुदा ना करदे मेरे इंतज़ार को।