एक लड़की भीगी भागी सी
एक लड़की भीगी भागी सी
फ़ैजा़बाद एक खूबसूरत शहर। यह की आबो हवा में ही एक नज़ाकत और अदा है। और अगर बात सलीम मियां की हो तो वो इसका विपरीत कहें तो गलत ना होगा।पता नहीं कौन सी दुनिया के हैं।घूमना फिरना,मौज मस्ती, दोस्तों के साथ आवारागर्दी,बस सलीम का यही काम है।सुबह हुई नहीं कि बैठ जाते हैं मोहल्ले के कोने पर बने होटेल में दोस्तों के साथ।उसके बाद बस मज़ाक मस्ती।ऊपर से मॉनसून का मौसम।मस्ती तो दुगनी बारिश में हो ही जाती है।
उस दिन रोज़ की तरह,सलीम और उसका दोस्त राजेश होटल में बैठे चाय पी रहे थे।
होटल का नौकर आया और बोला,"सलीम भैया,साहब कह रहे पुराना हिसाब नहीं चुकाया।"
सलीम -"अपने साहब को बोल भाग नहीं रहा।रोज़ तो आता हूं।चुका दूंगा। समझा।चल दो चाय और ला।"
अभी यह बात कर ही रहे थे कि दो लड़कियां वहां से निकलीं।उनमें से एक ने बुरखा पहना था।उसमें से उसकी आंखें झलक रही थीं।सलीम ने कभी भी ऐसी खूबसूरत आंखें नहीं देखीं थीं।हरा रंग,बड़ी बड़ी आंखें।बस वह उन आंखों का दीवाना हो गया।
राजेश --"अरे भाई सलीम क्या हुआ?कहां खो गए?"
सलीम --"कहीं नहीं!"
रात में भी वह उन्हीं के बारे में सोच रहा था।उसको नींद ही नहीं आ रही थी।"आखिर कौन थी वो लड़की?इतनी सुंदर आंखें हैं जिसकी,वह खुद कितनी सुंदर होगी? कहां ढूंढू उसको?",बस रात भर यही सोचता रहा।
सुबह फिर होटल पर सलीम पहुंच गया।पर आज तेवर कुछ अलग थे जनाब के।
राजेश --"क्या हुआ आज तुझे?इधर उधर कहां देख रहा है,सलीम।किसी का इंतजार है,क्या?"
सलीम --"कल दो लड़कियां निकलीं थीं।याद है तुझे?"
राजेश --"कौन सी?"
सलीम --"अरे जिसमे एक बुरखे वाली थी।उसकी सुंदर आंखें। हाए।"
राजेश --"अच्छा जी।तो जनाब को उसकी आंखों से इश्क़ हो गया है?क्यों सही कहा ना?"
सलीम --"हां यार।बस उसकी एक झलक कहीं दिख जाए।"
कई दिन बीत गए।सलीम मियां की वह झलक वाली इच्छा पूरी नहीं हुई।
रात को सलीम मियां निकले।बाहर बहुत तेज बारिश हो रही थी।मॉनसून की फुहार का मज़ा ही कुछ और होता है। ऐसे में बाहर जाए बिना किसका मन मानेगा?ऐसी बारिश में सलीम अकेले ही घूमते हुए निकल गए। एक ढाबे पर बैठ कर चाय पीने लगे।अचानक सामने के बस स्टॉप पर उनकी नज़र पड़ी। वहां एक लड़की बैठी भीग रही थी।उसने बुर्खा पहन रखा था। सलीम थोड़ा आगे होकर देखने गया। ये तो वहीं आंखें थीं जिन्हें वो इतने दिन से ढूंढ रहा था।वही खूबसूरत हरी ,बड़ी बड़ी आंखें।
सलीम ने मन में सोचा,"उफ्फ इतनी खूबसूरत आंखें।काश ये चेहरा भी देख पाता।अल्लाह कुछ तो करे।"
बहुत तेज़ हवा चलने लग गई। लड़की अपना बुर्खा हाथ से पकड़ने लग गई।पर हवा थी जो रुकने का नाम नहीं ले रही थी और ना बारिश थमने का।अचानक लड़की के चेहरे से नकाब हट गया। सलीम खड़ा देखता रह गया। इतनी खूबसूरत लड़की उसने कभी भी नहीं देखी थी। उसके चेहरे पर पड़ने वाला बारिश का पानी उसकी खूबसूरती को बढ़ा रहा था।जैसे शबनम की बूंदें फ़ूल पर पड़ रही हो।उसके मखमली हाथों पर बारिश पड़ रही थी।
सलीम तो अपनी सुध ही खो बैठा।वह भीगता हुआ उसको देख रहा था। भीगा तो मॉनसून की फुहार में वह कई बार था।पर ये भीगना कुछ अलग ही था। अचानक एक बस अाई और वह उस बस में चढ़ गई।उस भीगी ,खूबसूरत आंखों वाली लड़की को बहुत देर तक सलीम निहारता रहा।
आंखों में बस चुकी थी वह अनाम लड़की सलीम के।जब भी मॉनसून की बारिश होती है ,सलीम वह मंज़र भुला नहीं पाता।इंतज़ार रहता है उसको फिर से उसी दीदार का।
the end..